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Monday, 14 December 2015

दर्द दिलों के कम हो जाते...

‘आजतक’ न्यूज़ चैनल पर ‘एजेंडा’ कार्यक्रम में कपिल देव और इमरान खान उपस्थित थे कपिल देव के ये कहने पर कि मेरा राजनीती में आने का कोई इरादा नहीं है मैं ऐसे ही ठीक हूँ | इमरान खान को ये बात चुभ सी गयी तो उन्होंने कहा – कि मेरा दिल दूसरों के लिए दुखता है इसलिए में अपने मुल्क के लिया कुछ करना चाहता हूँ | एक सवाल- जो कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी ने किया तो इमरान खान बड़े उत्साह में बोल पड़े- आप पाकिस्तान आ जाइये फिर हम दोनों साथ मिल कर राजनिति करेंगे रागिनी ने कहा- मैं यहीं ढीक हूँ | थोड़ी ही देर बाद एबीपी न्यूज़ पर इमरान खान कि दूसरी पूर्व पत्नी रेहम खान ने उनकी इस उत्साही दावत कि हवा निकाल कर रख दी | रहम ने बतया- कि उन्हें इमरान व् उनकी पार्टी ने भारत आने से रोका था |

शादी से पहले उनका प्रोफेशन सबको पता था फिर भी उन पर पाबंदियां लगाईं गयीं | रहम ने अपने और इमरान की राहें और उसूल भी अलग होने की बात कही, तो सब जानते है इमरान खान आईएसआई और वहां कि फौज का भारत के प्रति जो नजरिया है उसके कड़े समर्थक है, हो सकता है रहम इसका भी विरोध करती हों | इमरान को ये भी डर था कि कहीं उनकी पार्टी का चेहरा रहम खान न बन जाएँ हो सकता है ये बात सच हो | उन्होंने कहा तो ये भी कि दोनों देशों कि आम और ख़ास दोनों तरह कि महिलाओं को बहुत कुछ सहना पड़ता है उन्हें महिला होने कि कीमत चुकानी पड़ती है ये बात सही है, इस तरह की बातें और भी सेलिब्रिटी कह चुकी है | महिलाये आज अलग – अलग फील्ड में है, और अपने काम को अच्छे से अंजाम भी दे रही है चाहे बह कुछ भी बन जाएँ लेकिन पुरुषों की नज़र में घर के हर काम में पूरी तरह परफेक्ट होनी ही चाहिए | बच्चे पैदा करने और रोटी बनाने के लिए ही वे दुनियां में आई हैं उसकी औकात इतनी सी है उसे बस यही एहसास कराया जाता है |

उससे अलग उनका कोई सपना कोई विज़न हो ही नही सकता जैसे ही महिलाएं अपाने हुनर अपने सपने को लेकर सोचती है आगे बढती है उन पर वार शुरु हो जाता है | पति, परिवार, पूरा समाज उनके खिलाफ आ खड़ा होता है | सारी उम्र ओरतों को सिर्फ त्याग और तसल्ली का ही पाठ पढ़ाया जाता है सिर्फ दुखी महिलाओं और उनके ख़राब पतियों के ही उदाहरण सुनाये जाते है, जैसे सुख की चाह रखना कोई गुनाह हो, पुरुषों की अहंवादी सोच का ही परिणाम है कि ऐसे किस्से देखने सुनने को मिलते है, पुरुषों को लगता है स्त्री इंसान ना होकर कोई मोम की गुड़िया है कि जब चाहो अपने हिसाब से उसे आकार दे दो, ये सोच ही उनके लिए दुःख, हताशा, बेचेनी, नफ़रत और हिंसा पे उतारू करती है | भारत में भी अगर सेलिब्रिटी की छोड़ दें तो सामान्य महिलाओं की हालत सही नही कही जा सकती और दुखद बात ये भी है कि महिलाओं को महिलाओं का ही सपोर्ट नही मिल पाता फिर समाज कि बात ही और है | माहिलाओं के खिलाफ पुरुषों ने ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है जिसे बह आज तक नही तोड़ पायी है और महिलाओं के प्रति अपनी नफ़रत का इलाज नहीं ढूढ़ पायीं है | जिस दिन महिलाएं ही महिलाओं के साथ खड़ी हो गयी तो इनके आधे दुःख अपने आप ही दूर हो जायेंगे |

Saturday, 21 March 2015

हम थे जिनके सहारे - (नकल पर व्यंग)

बात यू. पी. की है  उस समय प्राइवेट फॉर्म्स भरकर पढ़ने वालों की संख्या ज्यादा हुआ करती थी' बोर्ड एग्जाम किसी उत्सव से कम नही होते थे बसंत  ऋतु चल रही होती थी खेतों में लहराती पीली - पीली सरसों, अरहर के हरे भरे खेत, धूप में सोने सी चमकती गेहूं के वालें सरसर बहती हवा, घरों से आती देसी घी से बने पकवानों की भीनी खुशबू  तन मन को ताजगी से भर देती थी. बसों में भर भर कर छात्र अभिभावक रणबांकुरों की तरह पूरी साज सज्जा के साथ प्रस्थान किया करते थे जहाँ भी जाते थे बहां के गली मोहल्ले को आवाद कर देते थे लड़के लड़कियों की जो चुहल बाजी होती थी वो रौनकें ही सालों साल याद रह जाती थी.

हलवाइयों की पौ बारह हो जाती थी इधर मार्च अप्रैल में, उधर मई जून में. मार्च में जब एग्जाम चल  रहे होते थे उस समय पैसों का नहीं मिठाइयों का दौर था इसके अलावा खोया, दूध, दही और घी से भरे डिब्बों और दालों, आलू और धान के कट्टों का भी चलन था।  जब रिजल्ट आउट होता था उस समय मिठाई के साथ साथ पके रसीले आमों, तरबूजों, खरबूजों, अमरूदों को भी गिफ्ट स्वरूप दिया जाता था।
  रिजल्ट आया तो हम एक टीचर महोदय के घर बधाई देने पहुंचे उनका बेटा प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण हुआ था जी भर भर कर प्लेट भर भर कर लोग मिठाई का आनंद ले रहे थे अचानक पिता जी बाहर से प्रकट हुए- तो बिटवा डिब्बा ले कर पहुँच गया मिठाई खाओ पापा। पर ये क्या पापा महोदय तो ताव में आ गए बेटे पर पिल पड़े लात घूंसों की जम कर बौछार कर दी साथ ही बड़बड़ाते जा रहे थे - मिठाई खाओ, मिठाई खाओ, कलक्टर बन गए हो जो मिठाई बटवा रहे हो. माँ - ने बीच बचाव किया बताया - मिठाई तो ए बी सी बगैरह -२ लाये थे.

हम सोचने लगे ये लोग काहे को मिठाई लाये थे पता चला ये नकल करवाने का इनाम था. कुछ स्कूलों में धड़ल्ले से बोर्ड एग्जाम में नक़ल चला करती थी. कभी -२ तो नकल कराना बड़ी भारी पड़ती थी. बेचारे जीजा साले को, चाचा भतीजे को, पिता पुत्र को भाई भाई को दोस्त दोस्त को दोमंजिले तिमंजिले इमारतों की खिड़कियों पेड़ों की डालियों पर चढ़कर नकल की पर्ची पहुंचाते थे बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी डंडे खाने पड़ते थे।  किसी की शर्ट फटती थी किसी की पेंट उधड़ती थी किसी की टोपी उछलती थी किसी की धोती खुलती थी. क्या नज़ारा होता था नकल पहुचाने वाले आगे -२ पुलिस पीछे -२ , आस पास के खेत, इनके छिपने का स्थान हुआ करते थे कुछ तो डर कर निकलते ही नही थे उधर इन्तजार में  बैठा बेचारा परीक्षार्थी का दिल रोता था - हम थे जिसके सहारे वो हुए न हमारे।

कहीं कहीं तो छात्रों की बल्ले -बल्ले थी \कुछ स्कूल तो बाकायदा अपने स्कूल का परिणाम प्रितशत बढ़ाने के लिए युक्ति लगाया करते थे \कभी -कभी खुद मैनेजर तक मैसेंजर बन जाया करते थे। उन दिनों मोवाइल का इतना चलन नहीं था ,सो कई सारे लोग घात लगाकर बैठ जाया करते थे। जैसे ही फ़्लाइंग स्क्वायड की गाड़ी निकली फौरन मुस्तैदी से भाग -भाग कर अपने काम पर लग जाते थे। एक बार तो फ़्लाइंग स्क्वैड ने सोचा पीछे से पकड़ते हैं। वे सीढ़ी पर चढ़ भी नहीं पाये थे कि धाँय -धाँय किताबें ,कुंजी ,पर्चियां उनके सिर पर आ के पड़ीं। तभी से वहां से बोर्ड परीक्षाएं गायब हो गयीं। लेकिन नकल जिंदाबाद वहां न सही तो और जगह नए रंग -रूप में फर्राटे से दौड़ रही है।

नकल हो भी तो क्यों  नहीं। सिलेबस  में एक  एकांकी था 'बहू की विदा '. बेचारे बच्चे को या तो मास्साब ने पढ़ाया नहीं  या  उसके समझ में आया नहीं। उसने लिख मारा -'बहू की विदा होती है तो वो ऊँ ऊँ करके रोती है बहुत सारी औरतें उसे तांगे तक छोड़ने जाती है और लोटे में पानी लेकर जाती है ताकि बहू का गला सूख जाये तो बह कुल्ला कर सके ऐसे में बेचारे की लुटिया तो डूबनी ही थी सो नकल का सहारा लेना जरुरी था कभी-२ नकल करते -२ अकल पर पत्थर भी पड़ जाते थे साइंस का पेपर था कहीं पर 'उबला पानी' लिखना था एक से मिस्टेक हुई तो सब मिस्टेक से लिखते चले गए 3 बला पानी, कुछ ने तो हद ही कर दी ' तीन बला पानी'. ऐसे कई होनहार चिरागों को मैंने देखा है आगे कुछ ना कर सके, लेकिन कुछ की किस्मत  तो साथ दे ही देती है.

Thursday, 12 March 2015

शिक्षा और जागरूकता....

आमतौर पर जागरूकता का सम्बन्ध शिक्षित या अशिक्षित होने से लगाया जाता है पर मेरा अनुभव कहता है शिक्षित होने से जागरूकता का कोई सम्बन्ध नहीं है. क्यों कि एक शिक्षित गृहणी को कोई ये पता होता है साफ सफाई क्यों जरूरी है फिर भी नही करती, लेकिन एक अनपढ़ गृहणी घर की साफ सफाई को जरुरी समझती है इसलिए नही की कोई बड़ा कारण है बस उसे अच्छा लगता है, उसे लगता है घर को घर जैसा ही लगना चाहिए कबाड़खाना नहीं।
 एक होम साइंस की टॉपर फल सब्जी धोकर नही काटती और जब काटकर धोती भी है तो बस उसे धोना नही पानी डालना कहते है जब कि उसे सब कुछ पता है लेकिन एक अनपढ़ गृहणी कहती है साग या मूली काटकर धोने से सही से धुल नही पाती मिट्टी रह जाती है जब की वो ये नही जानती है की पौष्टिक तत्त्व नष्ट होते है पर काम वो सही तरीके से करती है।
शिक्षित होने का अर्थ होता है व्यक्तिव का विकास जिसमें व्यक्ति निरर्थक सोच से सार्थक सोच की तरफ बढ़ता है लघुता से श्रेष्ठता की ओर बढ़ता है, पाशविक प्रवृति से मनुष्यता की ओर बढ़ता है लेकिन यहाँ तो उल्टा हो रहा है रैगिंग के नाम पर जो अमानबियता हो रही है वे पढ़े लिखे जाहिल ही तो करते है बही आगे चलकर इंजीनियर, मैनेजर, डॉक्टर,अधिकारी बनते है ये वे छात्र होते है. जो पढाई के साथ साथ गर्ल फ्रेंड को भी मैनेज करते  है और बात प्यार से स्टार्ट करके सारी हदें पार कर जाते है इनके लिए फीलिंग्स का मतलब सिर्फ मजाक उड़ाना होता है।
कहते है पढ़े लिखे आदमी के बिहेवियर में बिनम्रता आती है वह अपनी सफलता से घमंड में चूर नहीं होता मगर ऐसा ही होता है अक्सर सफल वियक्ति सामने वाले को उसके छोटेपन का अहसास कराने में पीछे नही रहता ज्यादातर पढ़े लिखे लोग ही रोड के रूल्स को फॉलो नहीं करते और अपनी गलतियों से दूसरे की जान पर बन आने देते हैं कभी- कभी बात गाली गलौज और मार पीट पर भी उतर आती है ये कहीं न कहीं रोज़ का नज़ारा होता है इनको ऐसा लगता है की हर कंडीशन का सामना सिर्फ मारपीट से ही हो सकता है पढ़े लिखे लोग ही औरतों की इज़्ज़त नहीं करते लड़कियां भी पता नहीं किस दौर में जीतीं है जो जाल उनके लिए बुना गया है उसमें फस कर खुश होतीं हैं और कुतर्कों से खुद को समझदार मानने की गलती करती है जैसे वह लड़की हैं तो किसी को भी अपनी तरफ अट्रैक्ट करके अपना काम निकलवा सकतीं है.

लेकिन इसके लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ती है जिसका उन्हें रत्ती भर भी का मलाल नहीं होता वो कहती हैं हम ऐसा कर सकते थे गॉड ने हमें ऐसा ही बनाया है तो हमने किया इसमें बुराई क्या है? एक पढ़ा लिखा जागरूक इंसान ऐसा होता है क्या ? इसी लिए मुझे लगता है कि ढोल पीटना बंद करना चाहिए की शिक्षा के अभाव की बजह से जागरूकता की कमी है आज घर घर में हरेक चरित्र में पॉलिटिक्स समां गयी है हर आदमी नफा नुक्सान तोल कर बात करता है वह जागरूकता की परिभाषा अपनी तरह से ही करता है और आगे बढ़ता है जो की बहुत ही नुकसानदायक है इस सोच से उभरना बहुत ही जरुरी है बरना सारी इंसानियत ही सड़ाँध मारने लगेगी।

Saturday, 7 March 2015

वो मुकदद्ऱ से बादशाह बने बैठे हैं

अगस्त के महीने में मेरे बच्चे के स्कूल में फैंसी ड्रेस कम्पटीशन था।  इस कारण उसे सैनिक की ड्रेस चाहिए थी. पता चला उसी के स्कूल के पास ही ये ड्रेस मिल जाएगी।  बहीं पर एक पाश इलाके में जहाँ बड़े आलिशान घर बने हुए थे उन्हीं में से एक में ये ब्यबस्था थी। जब हम गेट पर पहुंचे तो १२-१३ साल के लड़के ने बड़ी देर में ताला खोलकर अंदर बुलाया। फिर एक ६५-७० साल के दम्पति बाहर निकल कर आये.....  उन्होंने हमसे बात की.…  पति जितने प्यार से बात कर रहे थे पत्नी उतने ही अक्खड़ टाइप की थी उन्होंने कहा - अगर कल आपने ड्रेस बापस नही की तो दूसरे दिन का भी चार्ज लगेगा। मैंने कहा- मैं शाम के बक्त बापस कर दूंगी।।। बे बोलीं - देखो हम मॉर्निंग में ८ बजे से पहले और शाम को ६ बजे के बाद गेट नही खोलते फिर तो तुम परसों ही आना, परसों यानी रविबार को दोपहर में हम ड्रेस लौटने गए तो गेट के पास खड़े होकर पहले पत्नी ने किसी से फ़ोन पर बात की और पति के सीने में दर्द की बात बताई फिर गेट खोला।
जब हम बहां से निकले तो उस घर में काम करने वाली बाई भी हमारे साथ निकली मैंने उससे पूछा - ये लोग अकेले रहते हैं? उसने कहा - अरे मैडम क्या बताएं लड़का बिदेश में रहता है इस बात का इन्हें इतना घमंड है  कि  किसी रिश्तेदार या जान - पहचान वाले सीधे मुंह बात तक नही करते फिर कौन आये इनके पास भला, पैसा तो इनके पास खूब है पर ना खुद के पास चैन है न दूसरों को चैन  रहता देख सकते हैं.।  दिन भर ताला लगाये रहते है फिर भी फैंसी ड्रेस का तामशा पाले हुए हैं।  एक लड़का इन्होने रख रखा है वो तो समझो नरक सा भुगत रहा है..  बह आगे कहने लगी - मैडम यहाँ पे जितने घर है सब में सीनियर सिटीजन रहते है सबके बच्चे बिदेशों में है किसी बात की कमी नही है पर व्यबहार नाम की चीज़ नही है..  ऐसा लगता है  दिल तो इनके पास है ही नही जिन्दा मशीन समझो। मैंने कहा- बच्चे साथ में नही है ना इसी लिए चिड़चिड़े  हो रहे हैं ये लोग. बह मुहं बिगाड़ते हुए बोली ना -ना, ये लोग है ही ऐसे. पहले मेरी सास आती थी इन्हीं घरों में वो बताती हैं- पहले भी इनके मुहँ ऐसे ही सूजे से रहते थे जवानी के दिनों में भी. अरे क्या कहे - हम गरीब ही सही लेकिन मरी ऐसी अमीरी हमें तो कभी  भी ना चाहिए जहाँ इंसान, इंसान को न समझ पावे, ना इंसान की तरह जी पावे, ये जीना भी कोई जीना है हुँ।  

सावन की तड़तड़ाती, गड़गड़ाती भारी बारिश में मुझे एक मिस्ठान भण्डार में शरण लेनी पड़ी.  बहां कुछ लोग और भी थे।  दो घंटे बीत गए हर जगह पानी ही ही पानी था बाकी सब तो परेशान थे की कैसे घर जाये पर मिष्ठान भण्डार के मालिक मालकिन जिनकी उम्र करीब ६०-६५ ही रही होगी उन्होंने इस बारिश का खूब आनंद उठाया। हमारे सामने दसियों पैकेट लेज़ और कुरकुरे के खा लिए फिर उन्होंने चन्द्रकला मगाया और गपागप वो भी खा गए बहीं  एक महिला ३ साल के बच्चे के साथ खड़ी थी बच्चा बारबार उन लोगों की तरफ देखता और माँ से चिप्स मागता बो दम्पति भी उसे चश्में में से झांक कर देख ले रहे थे लगता था जैसे कह रहे हों  बेटा फ्री में न मिलने का, मां ने एक लड़के को बुलाकर १०० का नोट दिया - भैया १० या ५ वाला चिप्स का पैकेट हो दे दो लड़के ने गुर्राते हुए कहा छुट्टा लाओ तो मिलेगा माँ फिर गिड़गिड़ाई भैया प्लीज - २ घंटे से हम यहीं खड़े हैं बच्चा भूखा है मैंने अपने पर्स में  हाथ डाला ५० का नोट देते हुए कहा- ५० का छुट्टा हो जायेगा, लड़के ने ना में सर हिला दिया\  वो दम्पति भी ये नज़ारा देख रहे थे, उन्हे ये भी नही लगा की पैकेट तो छोड़ो- वो जो लम्बे- लम्बे पैकेट हाथ में लिए बैठे थे और बंदर की तरह उछल- उछल कर एक के बाद एक खाए जा रहे थे उसी में से २- ४ चिप्स उसे निकाल कर  दे देते तो रोते बच्चे की आत्मा तृप्त हो जाती और बहा खड़े लोगों के मन में सम्मान के पात्र बन जाते ऊपर से बहां जाओ तो कहते है हम कभी भी मिलावट का काम नही करते -  ऐसे लोग भरोसे के काबिल हो सकते है क्या?  जिन्हें इंसानियत का   क - ख - ग तक नही पता.

मै अपनी एक परिचित से पहुँची  जिस दिन आर्य- समाज के संस्थापक का जन्म दिन था\ वो लोग खुद को बहुत बड़ा आर्य समाजी कहते हैं उनके सभी बच्चे ऊँचे पदों पर है और खुद भी पति पत्नी शिक्षक रह चुके है\ उसी समय उनकी बेटी बाहर से आई. और पडोसी के एक्सीडेंट के बारे में बात करने लगी\ बीच मेंही  माँ झुँझलाई - चुपचाप पढ़ाई करो जा के, अच्छा हुआ.…  देखा मेरी कैंची और पाइप रखने का नतीजा, अब देखना चौगुने पैसे लगेंगे तो पता लगेगा मुझे कुछ समझ में नही आया\ मैंने पूछा- आप किस बारे में बात कर रही है/ बो बोली - उसी एक्सीडेंट वाले की बीबी मेरा सामान रखे बैठी है और कहती है दे दिया, जितनी देर में मैंने कॉफ़ी पी उतनी देर में उनकी काम वाली जो स्टोर की सफाई कर रही थी\ एक थैला उठा कर लायी- उसने मेरे सामने ही उसे खोला उसमें एक कैंची और पाइप निकला बह बोली - दीदी यही  तो नही था\  उनकी जीभ दांतों में फस कर बाहर आ गयी...  फिर कुछ झेंपते हुए बोलीं -  नहीं बो  दूसरा था। 

यहाँ बात अमीरी या गरीबी की नही है इंसानियत और संस्कारों की है    जिन घरों के बड़ों के मन इतनी कड़वाहट से भरे होगे    वहां का माहोल भी नफ़रत से भरा होगा    ऐसे में कैसे कल्पना की जा सकती है की बच्चों पर इसका असर नही पडेगा?  फिर तो पीढ़ी दर पीढ़ी यही सोच चलती रहेगी फिर ऐसे लोगों से मिलकर जो समाज बनेगा  भयानक तो होगा ही। 

Thursday, 5 March 2015

तो पत्थर भी आँसू बहाने लगेंगे...

कल भी  सूरज निकलेगा, कल भी पंछी गाएंगे , सब तुझको दिखाई देंगे, पर हम ना नज़र आएंगे' आँचल में संजो लेना हमको, सपनों में बुला लेना हमको
ये लाइनें निर्भया के माता पिता को कितनी तकलीफ देती होंगी क्यों की एक रात मेरी आँखों से भी दो आंसू लुडक गए थे आखिर एक हँसती खेलती जिंदगी को यूं  तार तार कर देना किसी सभ्य समाज की निशानी है ?
और उन पापियों  का अब तक जिन्दा  रहना  देश के नाम में चार चाँद लगा रहा है क्या ?
आज एक बार फिर जब बीबीसी दुवारा बनाई गयी डॉक्यूमेंट्री' पर बवाल मचा है तब भी मुझे उसके माता पिता का ही ख्याल आ रहा है की वो किस मानसिक स्थिति से गुजर रहे होंगे? अगर मुकेश और उसके बकील जो बकबास कर रहे है वे इस देश के पुरषों की घिनौनी सोच का ही तो बखान कर रहे है. आज भी स्त्री को स्त्री धर्म सिखाने वालों  की कमी नही है  ऐसे लोगों की संख्या करोङो में होगी।
चाँद या मंगल मिशन की बातें बड़ी सुहानी लगती है पर हालात ऐसे है की बच्चा  घर के बाहर नही खेल सकता महिलाएं गली से लेकर ट्रेन-बस कहीं भी सुरक्षित नही है आदमी घर से निकले तो पता नही सड़क पर उसके साथ क्या हो सकता है हर तरफ खौफ का आलम है. किसी को भी किसी का भय नही हैं कानून और पुलिस से सिर्फ निर्दोष आदमी ही डरता है गुनेहगार नही. किसी की हत्या बलात्कार हो जाये तो मानवाधिकारबादी अपराधी के समर्थन में तुरंत उतर आते है की फलां-२ को मानसिक बीमारी है उसपे दया दिखाई जाये फिर कानून की जरुरत ही क्या है? क्यों की हर अपराधी की मानसिकता तो ख़राब होती ही है
प्रधान मंत्री ने लालकिले  से कहा था बेटों से पूछों कहाँ जा रहे है, क्या कर रहे हैं ? लेकिन ये बात उनसे पूछेगा कौन? समाज ने ये मान लिया है की लड़के होते ही है लड़कियों के साथ बदसलूकी करने के लिए. सब अपनी बेटी की सुरक्षा तो चाहते है लेकिन पडोसी की बेटी उन्हें  बेटी जैसी नही लगती
जो लड़कियां भुगत चुकी है वे जरूर जानती होंगी की पिता की उम्र या दादा की उम्र के व्यक्ति भी उनके लिए कम खतरनाक नही है जो लड़कियां स्कूल कॉलेज या जॉब के लिए बस या ट्रैन से सफर करती है वे बताती है की जो व्यक्ति उनके साथ रोज सफर करते है वे छेड़छाड़ के साथ प्रतिदिन ही मानसिक बलात्कार भी करते हैं क्यों  कि रोज़ ही उनका टॉपिक महिलाओं पर होने वाले अत्तियाचार ही होते है कई बार वे कुटिल मुस्कराहट के साथ घटी घटना का बड़ी बारीकी से पोस्टमार्टम करते है या फिर  नफ़रत के साथ लड़कियों को दोषी ठहराने का काम करते है वे आगे कहतीं है उन कुत्तों से लड़कर भी हम क्या करेंगे आखिर रोज़ सफर उन्हें भी करना है और हमें भी.

भारतीय पुरषों की मानसिकता आज से नही सदियों से ख़राब है और रहेगी यहाँ पर महिलाओं को सिर्फ भोग की बस्तु ही समझा गया. कबियों ने अपनी कविता में अश्लीलता रच डाली, आक्रमण हुए तो सेना ने दूसरे पक्ष की महिलाओं को नही बक्शा,  राजाओं ने राज्य में गणिकानगर जरूर बनाया।  ये तब के हालात रहे होंगे  महिलाएं घरों में कैद हो के रह गईं थी लेकिन बे सुरक्षित वहां  भी नही थी. कोई भी बच्ची किशोरी किसी भी अधेड़, लूले लँगड़े को मढ़ी जा सकती थी, बिधवा बिचारी खुली तिजोरी की तरह होती थी, एक सुआंग और रचा गया सर मुंडवाने का लेकिन कुरूप चेहरा अँधेरे में दिखाई थोड़े ही देता है, मैं एक ऐसे सत्तर बर्षीय महिला से मिली जिसकी कहानी रोंगटे खड़े करने वाली थी पति की मृत्युं के  बाद ससुर और जेठ ने उसका बरसों शोषण किया।
पुरषों को लगा ऐसे औरत को कंट्रोल करना मुश्किल है  सो उन्होंने नयी चाल चली बराबरी वाली आखिरकार बंधन ढीले पड़े, पढाई के नाम पर, नौकरी के नाम पर महिला घर से बाहर निकली, आत्मनिर्भर बनी तो सही फिर भी पुरषों के चुंगल से आज़ाद न हुई पहले दोस्ती का नाटक हुआ फिर स्वतंत्रता की बात हुई फिर योनिक स्वतंत्रता के नाम पर फिर से पुरुष के कंट्रोल में आ गयी, ये नीति काम कर गयी अब औरत खुद व खुद ही झांसे में आने लगी और पुरषों का काम बन गया.
बात यही खत्म नही हुई  लाखों महिलाएं वैश्यावृत्ति के दल दल में अब भी है पुरषों के लिए ही ना, फिर भी बलत्कार पे बलात्कार हुए जा रहे है फिल्मों में अश्लीलता भी यही कहती है औरत को नंगा करना है हर हालत में कही भी, कैसे भी इसी से पुरुष मन को सकून मिलता है,
रही सही कसर लिव-इन ने पूरी कर दी बात  आगे इतनी बढ़ गयी है अब मीडिया ने ऐसे सर्वे करना बंद कर दिया है जो पहले धड़ल्ले से होते थे जैसे- महिलाओं को सकून देती है पति के हाथों की पिटाई, लडकिया चाहती है वे प्यार किसी से करें और शादी किसी से, महिलाओं को भाता है गैर मर्द का साथ... ये  सब क्या था महिलाओं के खिलाफ बुना गया जाल ही तो था.
निर्भया के बाद से और भी कितनी घटनाएँ घट चुकी है अब तो सरकार भी बदल गयी लेकिन हालात जस के तस है कुछ और नही बस द्रढ इच्छा -शक्ति की कमी, महिलाओं के प्रति सम्बेदनशीलता की कमी और उन्हें बस मनोरंजन का साधन समझना ही कारण है.
समाज को फिर से सोचने की जरुरत है सोच बदलने की जरुरत है क्यों की जो लोग उस समय मोमबत्ती लिए घूम रहे थे उन्ही लोगों ने  फिर ३१ दिसंबर की रात जमकर धमाल भी मचाया था. 

Tuesday, 23 September 2014

अच्छे दिन कैसे आएंगे?

हिंदुस्तान के एक आधुनिक  शहर के रामलीला मैदान में सब्जी मंडी लगती है । ये मैदान अब तक दो भागों में बँटा  हुआ था। एक तरफ (जब रामलीला या शादी - ब्याह न हो तब ) सब्जी लगती थी और एक तरफ सभ्य समाज  दुआरा कूड़ा फेंका जाता था । सुवह हो या दोपहर या फिर शाम नजारा देखने लायक होता था । सुवह - लोग साइकिलिंग करते हुए, जागिंग करते हुए, वॉकिंग करते हुए, टॉकिंग करते हुए, सिंगिंग करते हुए, दातुन करते हुए, कुत्तों को ताजी  हवा खिलाते हुए  हाथों में कूड़ा लिए नज़र आ जाते थे। 

सुबह नौ से दस के बीच का नजारा और भी आधुनिक हो जाता था । रंग -विरंगी, मँहगी से मँहगी वाइक्स आकर रूकती और कूड़ा फेंकते हुए आगे बढ़ जातीं । ये समय घर से ऑफिस जाने का होता है । दोपहर में मम्मियाँ सजी - संवरी बच्चों को स्कूल से लेने निकलती तो सोचती चलो कूड़ा भी फ़ेंक ही देते है। शाम को भी जिन्हें सब्जी खरीदना  होती थी आते और डरते -डरते कूड़े की तरफ बढ़ते। क्यों की सांडों और कुतो का जमघट भी तो बहीं लगता था।  कभी कभी तो ऐसा लगता था की सुनामी या भूकम्प आ गया हो क्यों की लोग भागते ही ऐसे थे पता चलता था सांड लड़ पड़े या भाग खड़े हुए। कभी - कभी मुझे लगता था कि जितने जन यहाँ सब्जी बेचते है उनकी तो मजबूरी है और सालों से जो लोग सब्जी खरीदने आ रहे है या दस दिन रामलीला का आनंद ले रहे है उन्हें तो बदबू सुंखने का रिकॉर्ड बनाने के लिए गिनीज  बुक में दर्ज होना चाहिए। 

परेशान होकर एक जन प्रतिनिधि ने बहां से कूड़ा उठबाने के लिए कमर कस ली।  उसने कूड़ा हटबाने  के साथ ही पहरेदार भी नियुक्त कर दिए। जो भी कूड़ा फेंके उसे ससम्मान उसका कूड़ा बिना देर लगाये बापस कर दो ।  सुबह, दोपहर शाम बस यही नज़ारा था और तो और रात में भी एक तरफ जागते रहो दूसरी तरफ भागते रहो का ड्रामा चल रहा था। उस बेचारे ने तो जैसे बर्र के छत्तों में ही हाथ डाल दिया था इससे सुसंस्कृत जनता तो क्रोधित हुई ही जिनके पेट पे लात पड़ी उन्होंने पुलिस से शिकायत कर दी। गुस्से में भरे लोग एक दूसरे के दरबाजे पर कूड़ा फेंकने लगे देखते ही देखते हर गली कूड़े का अम्बार बन गयी। जब बिपक्ष के नेताओं ने हल्ला मचाया तो आनन फानन में पुलिस जगी और बेचारे को सलाखों के पीछे जाना पड़ा, परिवार को आमरण अनशन करना  पड़ा मामला अदालत तक पंहुचा। कैसे कैसे इल्जाम लगे कूड़े के बदले पैसे खाएं है। कमाल है कूड़े में भी भ्रस्टाचार ? मगर बह व्यक्ति बिलकुल पाक  साफ था उसकी ये पहल भी जन हित में थी। कुछ लोग ऐसे भी थे जो चाह कर भी कुछ नही कर  पा रहे थे। उनसे तो उसे आशीष ही मिला होगा। जिन लोगों के दिमाग में कचरा  भरा था बो अच्छे बुरे में फर्क नही कर सकते थे। उसने बार गलियां साफ करबाई कूड़े वाली गाड़ी मगबाई जिसमें लोगों से कूड़ा डालने की अपील घर -घर पेम्पलेट बटबा कर की। लेकिन लोग तो लोग है जो मजा चोरी छुपे कूड़ा फेंकने में हैं बो गाडी में फेकने में कहाँ?

मैदान तो साफ है फिर भी कोने गन्दगी से भरे ही रहते है। बहां न सही रोड के किनारे कूड़ा अपने पांव पसार रहा है क्यों की डस्टबिन भी लोग ही नही रखने दे रहे है। पर क्यों? किसी को क्या परेशानी हो सकती है ऐसे कूड़ा मारा - मारा फिरता है उसमें तो किसी का भी हित नही है। अपने पड़ोसी को एक पल प्यार से न देखने वाले लोग मोदी जी से चाहते हैं पल भर में अच्छे दिन ले आएं.। अच्छे दिन सिर्फ मोदी जी ही नही ला सकते? सच तो ये है की अच्छे दिन कभी नही आयेगे अगर जनता की सोच ऐसी ही रही तो!!! 


Saturday, 11 February 2012

Dukh Bantne Se Or Bhi Badhega…

Aksar jab insane dukhi hota hai, tab chahta hai koi aisa apna ho, jisse apna dukh bant sake, kahte hain ki dukh bantne se kam hota hai, lekin aaj ki date main dukh jitna batoge utna hi aapke liye jyada dukhdai sabit hoga, kyon ki log itne berahm ho chuke hain, ki doosare ke jale per namak chidkne main hi unhain maja aata hai. Har insaaan ki jindgee mein utaar chadhaw aate hi rahte hai, agar aap bhi dukhon se ghire huye hai, to kuch baton ka khayal rakhiye, sab dheek ho jayega.
  1. Ye duniya aansuon per hasti hai, or muskrahat se jalti hai, aap apane dukhon per doosaron ko hasne ka moka mat dijiye, jab bhi doosaron se milen, muskrahat ke sath milen.
  2. Ko kitna hi saga – sambandhi kyon na ho agar aapki income kam hai to bilkul bhi mat btayiye, kyon ki appka samman ya apmaan aapki money se hi shuroo hota hai.
  3. Addmi apne dukhon se utna pareshan nhi hota jitna uske naate – ristedaar, Jaan – pahchan ke log uski condition ka tamasha bnaker use dukh pahuchahte hain. Behtar hoga jab tak aapka wakt kharab chal rha hai, aise logon se doori hi bna kr rakhen.
  4. Ghabraiye nhin balki us din ka intzaar kajiye jab sab kuch theek ho jayega, andbiswasi nhi bane, lekin is baat ko bhi nhi bhoolen ‘ki jo aaj hai vo kal nhi rahega’ yahi nature ka rule hai, har aane wala kal beete kal se kuch alag hi hota hai.
  5. Kabhi aap is baat ko leker pareshan hote honge ki koi apna nhi, lekin jab aapke din phirenge to duniya ke suarthi log aapke ird – gird khud va khud ikatha ho jayenge, kyon ki Ugte Sooraj ko sabhi Jal dete hain, or ye baat kisi ek per nhi sabhi per lagoo hoti hai, Kyon Sooraj ka ugna or dhalna bhi nature ka ek rule hai.
  6. Kahte hain -  Jo log ladder saath-2 chadna suroo karte hai, to kuch log aage nikal jate hai or kuch log peeche bhi rah jate hai, lekin unki mulakat duwara jaroor hoti hai, kyon ki uper pahunch chuka aadmi nichle paydaan wale aadmi se ek baar phir takrata hai, tab ya to vah neeche uter rha hota hai ya neeche wala aadmi hi uske paas tak pahunch chukka hota hai.

Jeewan Chalne Ka Naam...

Ye vo wakt hai jab sakoon ke palon ko ungaliyon per gina ja sakta hai, ya phir bechani itni jayada hai ki chain ka ahsas hi nhi ho pata, or vo pal chupke se hi sark jate hain, kai baar insaan depression main aakr suicide krne ke bare main tak sochne lagta hai. Use lagta hai ki duniya bahut buri hai, usase door jana hi behtar hai, jab ki such ye hai ki duniya to acchi hai per usme rahne wale logon mein burai ne ghar kr liya hai. Khud per bharosha rakhiye, aap apne jhanjhabton se niklne ki koshish khud hi karenge to ek din nikal bhi jayenge, or jeet apki hi hogi.

1.    Jeewan main utsah or prerana se bhare gaane sune, ye gaane aapke man main new energy ka sanchar karenge, jaise
a.   Jeewan chalne ka naam, Chalte raho subaha or Shaam
b.  Jindgi ke yahi reet hai, Haar ke baad hi jeet hai
c.  Nadiya chale chale re, Dhara tujhko chalna hoga
d.  Jeena hai to has ke jiyo, Jeewan main  ek pal bhi rona na…
e.   Aana Jaana laga rahega, Dukh jayega Sukh aayega
2.      Apni preshaniyon ko diary main likh lejiye, ya kisi page per likhker use phad dijiye isse man jarror shant hoga
3.      Apni pareshaniyon ko apne Mata - Pita, Bahi - Bahin, Pati - Patni ya khas dost tak hi seemit rakhiye
4.       Kai baar haar kr jeene ka man nhi krta lekin us bajah ko talashiye jiske khatir jiya ja sakta hai, apno ke bare main sochiye jinke liye aap kitne ajeej or jarori hain
5.      Pareshaniyan hamesha apne poore suroor pr nhi rahti, lekin pareshaniyon se jhoojhne wale hamesha rahte hai kyon ki pareshaniyon ke pahad se takra- 2 kr itne majboot ho jate hain ki unhain muskilen bhi phir aasan lagne lagti hai
6.     Jab pareshan ho, to Nature ke bare main sochiye, andhera hota hai, roshani bhi aati hai, thand aati hai, garmi bhi aati hai, patjhad aata hai, sawan bhi aata hai, dhoop khilti hai, chaya bhi milti hai, Jab her ek ki vipreet cheez mojood hai, phir aapki pareshani ka end bhi hona hi chahiye
7.     Sunami, Earthquake, Cyclone jaisi prakritik aapda se jo ghar, gown, shahr ujadte hai, der-saber kaise na kasie baste hi hai. Pahle jaise roop main to nhi lekin toote phoote roop main hi sahi jindgi chalti hi hai, thamti nhi, Jindgi chalne ka hi naam hai thamne ka nhi
8.      Agar aap nirash ho kr kaam na Karen to bhi or kaam krenge to bhi result dono ka hi aana hai, accha yahi hoga, kaam krke hi result haasil kiya jaye…