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Saturday, 21 January 2012

रौशनी के वास्ते ये दिल भी जलाने होंगें...

२६ जनबरी की शाम एक परिचित के यहाँ सगाई थी, उसमें जाना हुआ .बहुत सारे लोग मिले. सभी देश और देश से जुड़ी समस्याओं पर ही विचार - विमर्श कर रहे थे . युवाओं में खासा गुस्सा था उनका कहना था -हम भी देश के लिए कुछ करना चाहते हैं लेकिन समझ में ये नहीं आता कहाँ से शुरुआत करें ? तभी एक रिश्तेदार ने कहा कि रिजर्वेशन नहीं हैं और निकलना रात में ही होगा. तुरंत कई स्वर गूंजे - मामाजी सुबह सही रहेगा बिना रिजर्वेशन के भी आराम से लेटकर जाना, डेली अप -डाउन करने वाले तमाम लोंगों से अपनी पहचान है , पहले तो वे लोग यात्रियों को प्यार से उठाते हैं और जब कोई नहीं उठता है तो सीधे बाहर उठा कर फेंक देते हैं , फिर चाहे किसी का सर फटे , पैर टूटे या दम छूटे.
लड़के बालों के जाने के बाद जब खाना शुरू हुआ तो लड़की के माता - पिता के आगे भी किसी ने प्लेट लगा दीं,लेकिन वे दोनों कोई कमी रह जाने के कारण आपस में  बात-चीत करने लगे .फिर जो हुआ काफी स्तब्ध करने बाला था . उनका छोटा बेटा दन-दनाता  हुआ आया और दोनों  की प्लेटें मेज पर पलट दीं "ये वकवास बाद में नहीं कर सकते थे क्या ,दोस्तों के सामने क्या इज्जत रह जाएगी मेरी "ये दोस्त व्ही थे जो अपनी पहचान यात्रियों को फेंकने वालों से बता रहे थे .देखते-देखते जिस लड़की की सगाई थी वो भी बरस पड़ी आके .यह वो परिवार है जिसमें से ग्यारह शिक्षक, दो इंजीनियर एक डाक्टर निकले हैं. परिवार से समाज बनता है और समाज से देश, मुझे लगा जो लोग अपने परिवार से संयम ,बड़ों का आदर और सहनशीलता जिए गुण नहीं सीख पाए न ही सार्वजनिक रूप से अपनों के साथ कैसे पेश आया जाता है यह समझ पाए वे लोग देश के लिए कुछ कर सकते हैं क्या ? कथनी और करनी में फर्क होता है अगर कोई वास्तव में इस तरफ से गंभीर है तो यह पूछने की जरूरत ही नहीं है कि हम देश के लिए क्या कर सकते हैं ?
  1. सरकारी कर्मचारी अपना निठल्लापन छोड़ दें ,समय से कम निपटाएं ,छोटे -छोटे कामों के लिए भी दूसरों से कुछ लेने कि आदत छोड़ दें .
  2. छात्र रैगिंग करना छोड़ दें ,छोटी -छोटी चीजों के लिए लड़ना छोड़ दें ,जो नशा करतें हैं उसको छोड़ने कि कोशिश करें ,गर्लफ्रेंड को इम्प्रेस करने के लिए गलत हथकंडे न अपनाएं ,जितना जेबखर्च मिलता है उसी में काम चलायें .
  3. अक्सर देखा जाता है  डिग्री लेने के बाद बच्चे घर का कोई काम  करना पसंद नहीं करते ,पैदल चलना पसंद नहीं करते तो माता -पिता के सहयोगी बनें,  भार न बनें .
  4. दल बनाकर अपने को सुपरमैन समझकर एक यात्री को मौत के मुंह में धकेलकर दुसरे को सीट दिलाना सेवा नहीं गुंडागर्दी है जो तुरंत रुकनी चाहिए .
  5. अक्सर अस्पतालों में रोगियों के साथ दुर्व्यवहार होता है ,उनके साथ जो समवेद्न्हीनता बरती जाती है वो नहीं होनी  चाहिए .
  6. जो लोग अपने फायदे के लिए मिलाबटखोरी  कर रहे हैं जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है. अगर किसी के मन में देश सेवा का जज्बा है तो उसे तुरंत अपने हाथ रोक देने चाहिए .
  7. शिक्षक ईमानदारी के साथ अपनी कक्षा में पूरा ध्यान दें .
अगर मै लिखने लगी तो पूरी किताब लिखी जा सकती है, यहाँ मेरा कहने का उद्देश्य मात्र इतना है कि हम जो कर सकते हैं पहले वो तो करें मंजिल को कदम दर कदम चल कर ही पाया जा सकता है एकाएक उछलकर नहीं बात वही करनी चाहिए जो सम्भव हो वरना आसमान को ताक कर जमीनी समस्याएं हल नहीं हो सकती हैं .
एक बहुत अमीर आदमी ने अपने अपराधी बेटे को विधानसभा चुनाव में खड़ा किया ,प्रचार के लिए उसने फिल्म इंडस्ट्री की नामी अभिनेत्री को उतारा.जो तस्वीरें अख़बारों में छपतीथीं उसमे वह अभिनेत्री उस लड़के के साथ बहुत ही असहज दिखती थी लेकिन जब पैसा लिया था तो ये सब भी करना ही था .उस  विधानसभा  क्षेत्र की सभी महिलाएं एकजुट हो गयीं और बहू-बेटियों का हवाला देकर पुरषों को भी मना लिया और वह हीरो बुरी तरह हारा,लेकिन बाद में उसके माता -पिता चुनाव लड़ेऔर लोगों में इतने नोट बांटे कि लोग अच्छा-बुरा भूल गये और पिताजी सांसद,माताजी विधायक हो गयीं .चुनाव के समय मुफ्त में शराब मिली मिली तो लोंगों ने जम कर पी फिर शराबी हो गये .दूर -दूर तक शराब की दुकान न थी सो  अब हो गयी ,कर्जदार हुए तो सांसद जी के रिश्तेदारों ने जमीनें खरीद लीं, अब  महिलाएं रोतीं हैं या गाली देतीं हैं लेकिन पुरष अब भी दुखी  नहीं हैं वे और गहरे दल-दल में फंसने की तैयारी में हैं कहते हैं -चुनाव आने दो ढंग से गिन्बायेंगे  .सार बस इतना सा है कि हम ही समस्या हैं हम ही समाधान हैं .चन्द्र प्रकाश दीक्षित जी का शेर है .
रास्ते बनते नहीं ,खुद ही बनाने होंगे
रौशनी के वास्ते ,ये दिल भी जलाने होंगे .

क्या गम है समंदर को बता भी नहीं सकता...

२४ जनवरी के दिन अधिकतर समाचारपत्रों में ''महिला एवम बाल विकास मंत्रालय '' भारत सरकार की तरफ से एक विज्ञापन छपा था . जिसमें प्रधानमंत्रीजी ,सोनियागान्धीजी एवम महिला एवम  बाल विकास मंत्री की फोटो छपी थी .बहुत बड़ा -बड़ा लिखा था -बच्चियों को जन्म लेनें दें .इन्हीं के दुआरा समय -समय पर बेटी बचाओ अभियान के अंतर्गत कन्या भ्रूण हत्या का विरोध किया जाता रहता है .मन में अजीब से भाव उभरते हैं कि ये क्या तमाशा है बच्चे जनना न जनना किसी भी माँ -बाप की अपनी समझ और सुविधा पर निर्भर करता है उसमें केंद्र सरकार का दखल क्यों ?थोड़ा हास्यास्पद सा लगता है जो जन्म ले चुकी हैं वे तो मर -मर के जी रहीं है और चिंता हो रही है अजन्मी बच्चियों की .
बात सिर्फ इतनी नहीं है कि बेटे  के मोह में बेटियों की अनदेखी हो रही है वल्कि बेटियों की जन्म से लेकर मोत तक अभिशाप भरी जिन्दगी को लेकर ही परिवार व् माता -पिता के मन में वित्रश्ना भर रही है .समस्या माता -पिता की सोच नही वरन समस्या इस समाज की सोच और हालात हैं .अक्सर लोगों के मुंह सुना जा सकता कि जाने कैसी माँ है ,ममता के नाम पर कलंक है ,डायन है .ऐसा कुछ नहीं है .हमें यह नही भूलना चाहिए कि वो पत्नी और माँ बनने से पहले किसी की बेटी थी .उसने अपने माता -पिता को उसके लिए जूझते हुए देखा होता है .उसने खुद भी उन परेशानियों को झेला होता है जिनको लेकर आशंकित और चिंतित होकर ही वो बेटी को जन्म नहीं देना चाहती या यों कहें कि वो उस भोगे हुए की पुन्राविर्ती नही चाहती .
जब भी मै उस माँ के बारे में सोचती हूँ जो बेटी नही चाहती ,एक ऐसी बेबस और लाचार माँ नजर आती है जो अपनी बेटी को समाज के बनाये चक्रवियुह से बचाना चाह रही होती है .जिसकी अंतरात्मा लहुलुहान होकर समाज को रह -रह कर कोस रही होती है साथ ही खुद के होने पर भी शर्मसार हो रही होती है .उस वक़्त वसीम बरेलवी साहव का ये शेर उस पर ही फिट होता देख रही होती हूँ कि-
क्या गम है समन्दर को बता भी नहीं सकता
बन कर आँख तक आंसू आभी नही सकता
प्यासे रहे जाते हैं दुनिया भर के सवालात
वो किसके लिए जिन्दा है बता भी नहीं सकता 
दार्शनिक अंदाज में कहा  जा सकता है कि बेटी को इस लायक बनाइए कि उसे किसी की मदद की जरूरत न पड़े .लेकिन घर से लेकर बाहर तक इतने बहरूपिये और भेड़िये मौजूद हैं कि लड़कियों की राहें आसान नहीं हैं .विडंवना देखिये जिन लड़कियों को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए माँ -बाप अकेले दूसरी जगह पर सीना तान कर भेज तो देते हैं .लेकिन वहां पहुँच कर पुरुष मित्र बनाना उनकी मजबूरी हो जाती है .क्या फायदा ऐसे कैरियर और बड़बोले पन का .जबलपुर मेडिकल कालेज का किस्सा अकेला नहीं है .हर क्षेत्र और छोटे -बड़े शैक्षिक केद्रों पर किसी न किसी तरह से लड़कियों का शोषण जारी है .लेकिन आगे बढ़ने के लिए ये सब करना ही पड़ेगा या आगे बढने के लिए कुछ भी करेगा या फिर बदनामी के डर से लोगों के मुहं पर ताले लगे रहते हैं .
अगर सरकार के पास वाकई लड़कियों के भविष्य को लेकर कोई योजना है तो पहले समाज को बदलने के लिए अभियान चलाये और शुरुआत उन सफेदपोश नेताओं से ही करे जिन्होंने नारी जाति को मात्र खेलने की चीज समझ रखा है .लड़कियों की सुरक्षा तो अहम है ही समाज की उस परम्परागत सोच पर भी चोट करना बहुत जरूरी है .की बेटी पराया धन होती है और ससुराल वालों की निजी सम्पत्ति .समाज के अनुसार -शादी के बाद बेटी के लिए मायके बाले गैर और ससुराल बाले कितने भी दुष्ट हों अपने होते हैं .समाज की इसी सोच के चलते बुरे वक़्त में बेटियों को मायके बालों का सहारा मश्किल से ही मिल पाता है .और अगर मिल भी जाये  तो समाज की नजर में वो ही गुनाहगार रहती है और उसका व् परिवार का जीना मुहाल  हो जाता है .इस सोच का बदलना बहुत जरुरी है .
लेकिन सच तो यह है कि सरकार से लेकर समाज तक माँ -बाप को गाली  देने के आलावा न कोई द्रष्टि है न कल्पना है न योजना है .ऐसे ही बस मातम मनाते रहिये और लडकियों की घटती संख्या के आंकड़े लगते रहिये .

फिर भागीरथ से कहो गंगा की धारा चाहिए !!!...

एक ओर अन्ना हजारे जी ने देश के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ विगुल फूँक दिया है, बहीं नवरात्र के व्रतों में कुट्टू के आटे में मिलावट के चलते सेकड़ों लोग जिन्दगी ओर मोत से जूझ रहे है. मिलाबट है कहाँ नहीं ? दूध, अनाज, मसाले, घी, तेल, मावा, मिठाई, पेट्रोल, डीजल इन सब में मिलाबट हैं. ये मिलाबट खोर कहीं उच्च तबके से नहीं आते, ये वे लोग हैं जिन्हें हम भोला - भाला मासूम समझते हैं. सच तो ये है कि मासूमियत अब रही ही कहाँ है अब तो हर जगह हैबानियत हावी है.
मिलाबट सिर्फ चीज़ों में ही नही हैं बल्कि हमारे चरित्र में ही हैं तभी तो जमीन या पैसे की खातिर बेटे अपने माता - पिता को  मोत की नींद सुला रहे हैं, भाई -भाई को काट रहा है, पति को पत्नी से नही दहेज़ से प्यार है. हर तरफ पैसे का ही खुमार हैं. चैन खींचना, बाइक या गाड़ियाँ उठना, फिरोती के लिए बच्चे ओर बूढों तक को उठा कर उन्हें नारकीय जिन्दगी जीने को मजबूर करना ये सब भ्रष्ट आचरण और राक्षसी प्रब्रति के ही उदाहरन हैं.
कुछ साल पहले कवि शैल चतुर्बेदी के बेटों ने एक एल्बम निकाला था " राम भरोसे हिंदुस्तान" जो बहुत पसंद किया गया था. कभी - कभी लगता हैं कि हिन्दुस्तान बाकई राम भरोसे ही चल रहा है. गावों के विकास के लिए सरकार जम कर पैसे दे रही है लेकिन वो पैसा सिर्फ चंद लोगों के ऐशो - आराम  के लिए ही काम आ रहा है.

ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ने वाले लोग जादातर ऊँचे रसूख वाले  वाले नही होते हैं लेकिन अब उनका राजनीति करने का तरीका देखिये- चुनाव से ढीक पहले एक दूसरे के खिलाफ खूब अफबाहें उड़ा कर बाजी उलट - पलट करना भी उन्हें आ गया है. प्रचार का तरीका देखिये- घर की बहू बेटियों पर लांक्षन लगाने से भी नहीं चूक रहे हैं. नफरत की  हद ये हो गयी हैं की एक प्रधान ने विधायक को बड़ी रकम देकर अपने कोटे दार से बदला लेने का अच्छा तरीका सोचा, कोटा उसकी पत्नी के नाम था उस बेचारी को बिना कुछ किये धरे जेल जाने की नौबत आ गयी. विधायक को समझाने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरी ताकत झोंक दी, कोटे दार की जेब भी खाली हो गयी तब जाकर विधायक ने मामले को रफा दफा होने दिया. ये घटना हमें यही बताती है की आज आदमी इतना नीचे गिर गया है कि उसे सिर्फ अपने अहम् की तुष्टि और पैसे के अलावा कुछ और दिखाई ही नहीं दे रहा है. ऐसा लगता है की हर आदमी एक अंधी दौड़ में शामिल है, अपने आस - पास क्या हो रहा है, क्या हो सकता है? इससे उसे कोई मतलब नहीं है.
डॉ. निशांत असीम ने लिखा है-
चंद इंसा रह गये, इंसान जब से मर गये
फिर भागीरथ से कहो, गंगा की धारा चाहिए
काश! की ऐसा मुमकिन हो पाता की भागीरथ फिर से इस धरती पर आ पाते और मरी हुई इंसानियत पुनर्जीवित हो उठती, और  खिल उठता वो जीवन जो करहाने को मजबूर है.
लेकिन ऐसा हो नहीं सकता. जो भी करना है, जैसे भी करना है, वो हमें ही करना है और शुरूआत पहले खुद से ही करनी होगी. 

आगे खिड़कियाँ भी आ जायेंगी...

बड़े ही दुःख और आश्चर्य की बात है कि इक्कीसवीं सदीं का आधुनिक समाज अब भी अन्धविश्वास और जादू -टोने में जकड़ा हुआ है .आये दिन समाचारपत्रों में तांत्रिकों दुआरा लोगों को हर तरह से ठगे जाने के किस्से पढने को मिलते रहते हैं .कुछ दिन पहले टी .वी पर कोड़े बरसा कर कोई  भी बीमारी ठीक करने का दाबा करने वाले तांत्रिक के वारे में दिखाया जा रहा था हांलांकि उस चैनल कि पहल पर ही उसे गिरफ्तार भी कर लिया गया था .
आज के समय में व्यक्ति पर इतना दवाव है कि अच्छे -भले आदमी का दिमाग तक पगलाने लगता है ,ऐसे में शांति और धैर्य से काम लेने की जरूरत होती है न कि किसी जादू -टोने के चक्कर में पड़ने की,यदि तांत्रिकों के पास वाकई चमत्कार करने की शक्ति होती तो सबसे पहले वे स्वयं का जीवन संबारते,संसार के सबसे सुखी इंसान होते ,क्यों वेकार ही दूसरों को बेवकूफ बनाने की तरकीबें सोचते रहते ?
जब हम समस्याओं से घिरे होते हैं तब हमें कुछ नहीं सूझता जो जैसा बताता है वैसा करने को तैयार हो जाते हैं. लेकिन बस थोड़ा सा दिमाग लगाने की जरूरत होती है कि सामने वाले के पास जादू की छड़ी है क्या ?तांत्रिक भी जानते हैं की सब तरफ से थका-हारा व्यक्ति ही उनके पास पहुँचता है .और वो जो -जो  बताते जाते हैं कि तुम्हारे साथ ये हुआ ,ऐसा हुआ तो लोग समझते हैं कि ये तो अन्तर्यामी है ,जिस पर गुजरती है वही जानता है ये बात सच है, लेकिन उतार -चढ़ाव सबकी जिन्दगी में आते हैं किसी के कम तो किसी के ज्यादा .
सुना है एक धर्मस्थल पर सभी धर्मों के लोंगों की आस्था है विशेषकर महिलाओं की .वहाँ इतनी भीड़ रहती है कि पुलिस को सारे दिन वाहनों की आवाजाही के लिए काफी मशक्कत करनी पडती है .चूंकि ये स्थल शहर से बाहर है तो चारों तरफ घने पेड़ और खेत हैं दिन में तक वहाँ अँधेरा छाया रहता है .वहाँ के खेतों में अक्सर उन लड़कियों की लाशें मिलती हैं जिन्हें उनके परिवार वाले वहाँ इलाज के लिए लाये होते हैं .कई वार मानसिक रूप से विक्षिप्त खुद ही भाग जातीं हैं और फिर नहीं लौट पातीं  और कुछ गायब कर दी जातीं हैं .गाँव के लोगों ने भी एकता बना रखी है कि लाश मिलते ही सब मिल कर ठिकाने लगा देतें हैं .उनका मानना है कि अगर पुलिस को खबर की तो खुद ही उलटे फंसेगें. ऐसा भी नहीं है कि इस बात की किसी को भनक न हो फिर क्यों वेकार पचड़े में पड़ें .एक व्यक्ति ने कई वार महिलाओं  को समझाने की कोशिश भी की उसका कहना था कि-ये मानसिक रूप से बीमार हैं इन्हें इलाज कि जरूरत है न कि यहाँ रखने की, उसकी किसी ने नहीं सुनी तो वह  एक पत्रकार के पास पहुंचा .पत्रकार ने भी हाथ जोड़ लिए कहा -ये बहुत ही सम्बेदनशील मसला है इसे छुआ भी तो न  जाने कितना खून -खराबा हो जायेगा उपर से राजनीती होगी सो अलग ,इससे तो चुप रहना ही बेहतर है .
कुछ साल पहले सहारनपुर से निकले निर्माता -निर्देशक मनोज नौटियाल ने एक सीरियल बनाया था 'लेकिन वो सच था ' उसमें उन्होंने चमत्कारों की पोल खोल के रख दी थी .ऐसे ही अभियान की आज भी जरूरत है .अगर जादू -टोने से कुछ हो ही जाता तो सबसे पहले राजनीतिक दल एक दुसरे को  नहीं छोड़ते ,फिर कुर्सी कभी किसी पर होती तो कभी किसी पर .नम्बर एक के पायदान पर पहुंचा अभिनेता आखिरी  पायदान पर आ जाता .ऐश्वर्या को नजर लगी होती तो कभी तबियत ठीक ही नहीं होती .ऐसा नहीं है कि ये लोग इस चक्कर में नहीं पड़ते ,जरूर पड़ते हैं लेकिन कभी नुक्सान नहीं उठाते ,नुक्सान आम आदमी ही उठाता है .
लोगों में जागरूकता लानी बहुत जरूरी है .जगह -जगह नुक्कड़ नाटक किये जा सकते हैं  .अन्धविश्वास से सम्बन्धित पाठ पाठ्यक्रम में में रखा जा सकता है . सबसे ज्यादा जो कर सकता है वो मीडिया ही है जो ये कह देता है व्ही सब बोलने और सुनने लगते हैं .सबसे पहले टी .वी .पर जो भ्रामक प्रचार दिखाए जाते हैं उन पर रोक लगनी चाहिए .स्वयंसेवी संस्थाएं भी आगे आ सकतीं हैं और लोगों को बेहतर तरीके से समझा सकती हैं .उनको ये समझाना बेहद जरूरी है कि जीवन और जीवन में आने वाले संघर्ष कडबे सच हैं ,और जो समस्याएं जिसके सामने हैं उसे ही झेलनी हैं ,कोई जादू -टोना इस सच्चाई को बदल नहीं सकता है .जो आज है वो कल नहीं रहेगा चाहे दुःख हो या सुख हो ,देर -सवेर समय बदलना ही है .डॉ कुंअर बेचैन का शेर भी इसी सच्चाई को सामने रखता है -
इन दुखों के कैदखानों में भी बस चलते रहो
है अभी दीवार, आगे खिड़कियाँ भी आ जायेंगी.

बाबा रामदेव स्त्री वेश में ?

अधिकतर लोगों की नजर में बाबा स्त्री वेश धरने के कारण हंसी के पात्र बने हुए हैं .बाबा का कहना है- कि सरकार उन्हें मरवाना चाहती थी और इल्जाम भीड़ पर डालना चाहती थी .दुर्भाग्यवश यदि ऐसा हो जाता तो म्रत्यु पर भी  तरह -तरह के सवाल उठते .हो सकता है उसे कायरतापूर्ण मौत ही करार दे दिया जाता .ऐसे में आसानी से खुद को मौत के हवाले करने से भागना ही अच्छा था.बाबा ने स्त्रियों के वस्त्र पहनकर कोई कायरतापूर्ण कार्य नहीं किया है वल्कि ये तो बहुत ही साहसपूर्ण कार्य है क्यों कि उनके स्थान पर कोई और रहा  होता तो ऐसा करने से पहले सौ बार सोचता और कर भी लेता तो अब तक घर में मुहं छुपा कर बैठा होता .
स्त्रियाँ पुरषों जितनी दम्भी ,अहिंसक और आततायी कभी नहीं हो सकती .प्रेम अहिंसा ,मानवता ,दयालुता ,परोपकार जैसे गुण पुरषों से कहीं ज्यादा स्त्रियों में होते हैं .भगवन राम ,श्री क्रष्ण ,महात्मा बुद्ध इनके विषय में भी कहा  जाता है कि इनमें स्त्रियों वाले गुण थे सिर्फ  इस लिए क्यों कि उनकी भावनाएं उतनी ही कोमल थीं जितनी कि स्त्रियों की होती हैं तो क्या वे मैदान छोड़ कर भागे थे ?नहीं ,श्री क्रष्ण से बड़ा कूतनीतिग्य तो न इस संसार में पहले कभी हुआ था  और न ही कभी होगा .मै इनसे बाबा की तुलना नहीं कर रही हूँ ,तुलना हो भी नहीं सकती बस इतिहास याद दिला रही हूँ .
मुझे नहीं लगता कि बाबा ने स्त्री वेश धारण करके कोई कायरता पूर्ण कार्य किया है .सारी दुनिया के सामने सीना तान कर यह कहना कि -हाँ मैंने माँ -वहिनों के कपड़े पहने और उस वेश में सारी दुनिया ने भी देखा हो ये बहुत ही हिम्मत का काम है और इस काम को कोई विरला ही अंजाम दे सकता है ,सबके बस की बात नहीं है स्त्री वेश धारण करना .
आचार्य बालक्रष्ण की नागरिकता पर भी प्रश्न उठने लगे है लेकिन वंग्लादेश से आये शरणार्थी तो न सिर्फ जवर्द्स्ती  घुस आये हैं वल्कि वे सारे अधिकार भी पा गये हैं  जो एक भारतीय नागरिक को प्राप्त होते हैं .उसके बारे में इसलिए कुछ नहीं बोला गया क्यों कि वे विशेष दलों के बोट बैंक बन गये हैं ?
जैसे आज सरकार बाबा के पीछे पड़ गयी है कि ऐसा कोई सवूत हाथ लग जाये जिससे बाबा पर नकेल कसी जा सके ,कभी देश के दुश्मनों के पीछे तो ऐसी तत्परता नहीं दिखाई .१९७१ के एक युद्ध बंदी की पत्नी ने मीडिया से कहा था कि-अगर उसके बेटा होता तो चाट का ठेला लगबा देती लेकिन उस देश की सीमा पर कभी नहीं भेजती जिस देश की सरकार इतनी गैर जिम्मेदार ,संवेदनहीन ,निकम्मी ,गूंगी और बहरी हो .९३,०००पकिस्तानी सैनिक इंदिरा जी ने लौटा दिए लेकिन सौ से भी कम अपने सैनिक वो पकिस्तान से नहीं ले पायीं इसे क्या कहा जायेगा -अति उत्साह ,बेबकूफी या दरियादिली ?जैसा रवैया पकिस्तान के प्रति कांग्रेस सरकारों का रहा है उसके चलते सेना पर क्या बीतती होगी बही जानती होगी तभी तो उसे बोट देने का अधिकार नहीं दिया गया है  क्यों कि निकम्मे लोग उसे नहीं चाहिए .
सुनील कुमार नाम के शख्स ने जनार्दन दूवेदी को जूता दिखाया यह बाकई अशोभनीय कार्य है लेकिन विचारणीय  तथ्य यह भी है कि वो ऐसा करने को मजबूर क्यों हुआ ? दिग्विजय जी ने जिस तरह आगबबूला होकर उसे लतियाया ,वहाँ मौजूद लोगों ने भी जम कर उसे पीटा यह भी तो शोभनीय कार्य नहीं था आखिर पुलिस तो अपनी कार्यवाही करती ही ना .कभी किसी आतंकवादी को जिसने यहाँ के निर्दोष लोगों का खून बहाया हो उसके लिए तो एक शब्द भी मुहं से नहीं निकलता क्यों ?स्वार्थ ध्यान में रहते हैं  या फिर अपनी गली में कुता भी शेर होता है ?.