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Saturday, 20 August 2016

आया था इस बार भी सावन

गुत्थियों सा है जीवन
जिनका हल ढूंढते -ढूढते
उलझ सा गया है मन
आभास था
अह्सास कब हो पाया ,अब जाने को भी है
आया था इस बार भी  सावन
हरे -हरे अंधेरों से पटे पड़े खेत
धूप में चमचमाता, ठहरा ,,,चाँदी सा पानी
पपीहे का स्वर हो या कीटों की मधुर झंकार
कागज़ की नावें, उनमें रखी पत्तों की पतवार
सब गायब होने को है ,अब जाने को भी है
आया था इस बार भी सावन
राखियों से सजी मनमोहक दुकानों को खूब निहारा                                      
खरीदा और लिफाफे में डाल भेजा भी
सिंधारे की बँटी  मिठाईभी खाई ,घेवर की खुशबू जैसे हर कोने में समाई
कुछ समझ में आया तो  'वीर' की याद बहुत आई
आँखें भी नम  होने को हैं   ,अब जाने को भी है
आया था इस बार भी सावन

Sunday, 14 August 2016

दूसरों की उम्मीद खुद बनिए

सभी की जिंदगी का कोई न कोई मकसद जरूर होता है और उसी के लिए सभी दिन-रात  एक किये रहते हैं। हम चाहें जितना काम कर लें ,सफल हों या असफल। .... मगर समाज में फैली सम्वेदनहीनता का आलम ये है कि गैरों से क्या अपनों से तक प्रसंशा या प्रोत्साहन के दो शब्द सुनने को नहीं मिलते। इंसान इतना अकेला हो चला है कि अगर कोई परेशानी आकर घेर ले तो सिवाय उसकी परछाई के उसके साथ कोई खड़ा नजर नहीं आता। हर आदमी तनाव और दुःख से भरा  गुस्से में दिखाई पड़ता है। सकूँ पाने के लिए व्यक्ति इधर-उधर हाथ -पावँ मार रहा है। कहीं सुन लिया या पढ़ लिया कि - शीशे के सामने खड़े होकर मुस्कराने का अभिनय करने से सकूँ मिल जाएगा। तो फिर इसी प्रयास में लगा रहता है कि शायद चेहरे पर रौनक लौट आये ,शायद जिंदगी में ख़ुशी वापस आ जाये। लेकिन ऐसा सम्भव है क्या ? आखिर लौटना हमें उसी वातावरण में है , उन्ही लोगों में है जहां से भाग कर वह नुस्खा आजमा  रहे थे ,
अगर जिंदगी में वाकई खुशहाली चाहिए तो उसके लिए एक मकसद बनाना पड़ेगा। क्यों कि जब तक हम यह नहीं चाहेंगे कि हमारे आलावा भी लोग खुश रहें तो सिवाय तकलीफों के कुछ हासिल नहीं होगा। अगर हमारा उद्देश्य यही है कि मेरे सिवाय कोई सफल न हो ,सम्पन्न न हो  ,सम्मानित न हो ,तो यह चाहत पूरी होने में कठिनाई तो आएगी ही फिर मन तनाव ,दुःख, घृणा की जलन से भर उठेगा। अगर वाकई लोगों को ख़ुशी चाहिए शांति चाहिए तो खुशियां बांटनी होंगी ,वैसा माहौल बनाना होगा। यकीन  मानिए जिंदगी खुशियों से गुलजार हो जाएगी।
हम सभी अपने घरों की साफ - सफाई इसी लिए करते हैं जिससे घर का  वातावरण शुद्ध रहेगा ,घर में सकारात्मकता आएगी और तन - मन भी स्वस्थ रहेंगे। लेकिन मन की झाड़ - पोंछ पर कोई ध्यान नहीं देता जब कि सबसे ज्यादा निगेटिविटी ,सबसे ज्यादा अँधेरा तो वहीं भर हुआ है। जब तक इंसान 'जिओ और जीने दो 'को अपना गोल अपना टारगेट नहीं बनाएगा सारी अचीवमेंट्स धरी रह जाएँगी। दूसरों के बारे में भी सोचना यह भी एक चैलेंज है ,एक अभियान है ,कदम आगे तो बढ़ाइये देखिये जिंदगी कैसे बदलती है। ख़ुशी बन कर दूसरों की जिंदगी में प्रवेश करिये आशावादी बनिये, आशाएं जगाइए। थोड़ा मुश्किल जरूर है पर नामुमकिन नहीं। अगर हम चाहते हैं ये दुनिया वाकई जीने लायक रह जाये तो पहल  तो करनी पड़ेगी।
दूसरों से ज्यादा उम्मीद मत बांधिए वल्कि दूसरों की उम्मीद खुद बन जाइए ,सारे दुःख -दर्द अपने आप स्वाहा हो जायेंगे। आपका मन इतना निर्मल।
इतना पावन हो जायेगा। जहां द्वेष की क्लेश की कोई गुंजाइश नहीं होगी , किसी से कोई अपेक्षा नहीं होगी तो खुद किसी से उपेक्षित भी महसूस नहीं करेंगे। ऐसे इंसान को सुखी होने से ,शांत होने से कौन रोक सकता है ?फिर न कोई अँधेरा होगा न कोई भय होगा। हर समस्या से सामना करने की हिम्मत खुद व् खुद आ जाएगी वल्कि आप दूसरों के लिए खुद ही समाधान बन जायेंगे। ऐसा उत्थान ,ऐसी प्रगति किसी भी प्रगति से उच्च होगी ,उत्तम होगी ,सर्वोत्तम होगी।

जो तुम असल में हो

आता है एक खुशग़वार  झोंका, गुजरे कल की बगियों से
खुशबुओं के साथ ,उड़ा लाता है कुछ पत्ते
स्नेह के ,प्रोत्साहन के ,प्रसंशा के
बन उठती हैं धूल भरी आँधियों से लकीरें
कुछ चेहरों की ,जो
मासूम हैं ,निष्पक्ष हैं ,निःस्वार्थ हैं
जो कहते हैं -तुम्हें रुकना कहाँ था ?
तुम फिर से उठो ,लड़ाई वाकी है अभी
तुम्हारी पहचान की ,अस्तित्व की ,तुम्हारे होने की
जो तुम असल में हो 

जिन्दगी और सपने


बैर है इनसे अपनों को ,परायों को
परायों को छोड़ो ,अपनों के द्वेष ज्यादा कसकते हैं
रोज सोचता हूँ ,छोड़ दूँ सोचना इनके बारे में
हर तीसरे दिन तोड़ डालता हूँ ,बड़ी बेरहमी से
खुद भी घायल होता हूँ ,भर जाता हूँ अथाह पीड़ा और चुभन से
उनके तड़प-तड़प कर दम तोड़ने पर
छटपटाता हूँ ,रोता  हूँ बहुत
जिनके आगे जीवन भी छोटा लगता था
कैसे जियूँगा उनके वगैर ,सिर्फ वे ही तो अपने थे
कि तभी चुपके से आहट  देता है रक्तरंजित जज्बा
जो लौटा लाता है फिर से उम्मीदों को
पुर्नजीवित कर देता है ,उन्हें दो -चार रोज में
वे प्राणवायु बन जाते हैं मेरे
फिर साथ हो लेता हूँ उनके ,बसा  लेता हूँ जीवन में
उन्हें पुनः तोड़ने के लिए ,एक और विश्वास लिए
वे टुकड़े -टुकड़े भले हो जाएँ कई बार
मगर मुझे टूटने नहीं देते, झुकने नहीं देते
ये सपने ही हैं ,जो मुझे मरने नहीं देते 

Saturday, 13 August 2016

कुछ अच्छा सा नहीं लगता...

सुबह आँख खुलते ही सब अच्छा ही हो
मन अच्छा रहता है ;तो दिन अच्छा गुजरता है
लेकिन ,गुमशुदा लोगों ,लाशों के फोटो ,लूट हत्या ,बलात्कार
बस बुराइयों से पटी ख़बरें
पड़ते ही नजर , जो मन को कर दे बेकार
ऐसा अख़बार,कुछ  अच्छा सा नहीं लगता

दुःख बाँटने से घटता है ,ख़ुशी बाँटने  से बढ़ती है
लेकिन ,ये सब कल की बातें हैं
अब इंसान न अपना दुःख ही बाँटना चाहता है न सुख ही
दुःख देते हैं दूसरों को ख़ुशी ,खुशियां देती हैं दूसरों को दुःख
कितनी वहशियाना हो चली है सोच
इंसान होकर ऐसा स्वभाव
यह  व्यवहार, कुछ अच्छा सा नहीं लगता

सत्यमेव जयते यह सदवाक्य अटल है
पर सच्चाई और अच्छाई परेशानी में पड़ी हुई है
खुद को सभ्य -सुसंस्कृत ,धनवान ,भगवान मानने वाले लोग
दूसरों को पल -पल लज्जित ,अपमानित करने वाले लोग
झूठ से सबको विचलित,आश्चर्यचकित करने वाले लोग
भले लोगों को बात-बात पर सिखाने लगें सदाचार
यह शिष्टाचार ,कुछ अच्छा सा नहीं लगता

पीएम से परेशानी, सीएम से परेशानी ,डीएम से परेशानी
सब समस्याओं  के लिए दूसरे ही हैं  जिम्मेदार
खुद के साथ सब करते रहें अच्छा
खुद न सोचें किसी के बारे में एक बार भी
सिर्फ अधिकारों की याद  रहे ,कर्तव्य भूल जाएँ
खुद सम्वेदनहीनता ,गैरजिम्मेदारी का ढीठ सा पुतला
औरों पर कसते रहें हर समय ताने
ऐसा इमोशनल- अत्याचार, कुछ अच्छा सा नहीं लगता

विचारों के बीच चल रही है जंग
कल्पनाओं में विचरती रहती है इनटॉलरेंस
हर पल भय के साये में जीतीं महिलाएं, लड़कियां ,बच्चे
घर ,गली ,ऑफिस ,अपने पराये सब नजर आते दानव
कितनी भी असहष्णुता हो जाये किसी फीमेल के साथ
इंसानियत और शर्म चली जाती है सैर करने बुद्धिजीवियों की
अत्याचारी के लिए फ़ौरन याद  आ जाते हैं मानवाधिकार
यही इनटॉलरेंस है कि मन में दया- करुणा की जगह भरे पड़े हैं कुविचार
अच्छे कल के लिए बहुत जरूरी हैं निर्मल होने विचार
सही सोच का हमेशा तिरस्कार, कुछ अच्छा सा नहीं लगता

Monday, 14 December 2015

दर्द दिलों के कम हो जाते...

‘आजतक’ न्यूज़ चैनल पर ‘एजेंडा’ कार्यक्रम में कपिल देव और इमरान खान उपस्थित थे कपिल देव के ये कहने पर कि मेरा राजनीती में आने का कोई इरादा नहीं है मैं ऐसे ही ठीक हूँ | इमरान खान को ये बात चुभ सी गयी तो उन्होंने कहा – कि मेरा दिल दूसरों के लिए दुखता है इसलिए में अपने मुल्क के लिया कुछ करना चाहता हूँ | एक सवाल- जो कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी ने किया तो इमरान खान बड़े उत्साह में बोल पड़े- आप पाकिस्तान आ जाइये फिर हम दोनों साथ मिल कर राजनिति करेंगे रागिनी ने कहा- मैं यहीं ढीक हूँ | थोड़ी ही देर बाद एबीपी न्यूज़ पर इमरान खान कि दूसरी पूर्व पत्नी रेहम खान ने उनकी इस उत्साही दावत कि हवा निकाल कर रख दी | रहम ने बतया- कि उन्हें इमरान व् उनकी पार्टी ने भारत आने से रोका था |

शादी से पहले उनका प्रोफेशन सबको पता था फिर भी उन पर पाबंदियां लगाईं गयीं | रहम ने अपने और इमरान की राहें और उसूल भी अलग होने की बात कही, तो सब जानते है इमरान खान आईएसआई और वहां कि फौज का भारत के प्रति जो नजरिया है उसके कड़े समर्थक है, हो सकता है रहम इसका भी विरोध करती हों | इमरान को ये भी डर था कि कहीं उनकी पार्टी का चेहरा रहम खान न बन जाएँ हो सकता है ये बात सच हो | उन्होंने कहा तो ये भी कि दोनों देशों कि आम और ख़ास दोनों तरह कि महिलाओं को बहुत कुछ सहना पड़ता है उन्हें महिला होने कि कीमत चुकानी पड़ती है ये बात सही है, इस तरह की बातें और भी सेलिब्रिटी कह चुकी है | महिलाये आज अलग – अलग फील्ड में है, और अपने काम को अच्छे से अंजाम भी दे रही है चाहे बह कुछ भी बन जाएँ लेकिन पुरुषों की नज़र में घर के हर काम में पूरी तरह परफेक्ट होनी ही चाहिए | बच्चे पैदा करने और रोटी बनाने के लिए ही वे दुनियां में आई हैं उसकी औकात इतनी सी है उसे बस यही एहसास कराया जाता है |

उससे अलग उनका कोई सपना कोई विज़न हो ही नही सकता जैसे ही महिलाएं अपाने हुनर अपने सपने को लेकर सोचती है आगे बढती है उन पर वार शुरु हो जाता है | पति, परिवार, पूरा समाज उनके खिलाफ आ खड़ा होता है | सारी उम्र ओरतों को सिर्फ त्याग और तसल्ली का ही पाठ पढ़ाया जाता है सिर्फ दुखी महिलाओं और उनके ख़राब पतियों के ही उदाहरण सुनाये जाते है, जैसे सुख की चाह रखना कोई गुनाह हो, पुरुषों की अहंवादी सोच का ही परिणाम है कि ऐसे किस्से देखने सुनने को मिलते है, पुरुषों को लगता है स्त्री इंसान ना होकर कोई मोम की गुड़िया है कि जब चाहो अपने हिसाब से उसे आकार दे दो, ये सोच ही उनके लिए दुःख, हताशा, बेचेनी, नफ़रत और हिंसा पे उतारू करती है | भारत में भी अगर सेलिब्रिटी की छोड़ दें तो सामान्य महिलाओं की हालत सही नही कही जा सकती और दुखद बात ये भी है कि महिलाओं को महिलाओं का ही सपोर्ट नही मिल पाता फिर समाज कि बात ही और है | माहिलाओं के खिलाफ पुरुषों ने ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है जिसे बह आज तक नही तोड़ पायी है और महिलाओं के प्रति अपनी नफ़रत का इलाज नहीं ढूढ़ पायीं है | जिस दिन महिलाएं ही महिलाओं के साथ खड़ी हो गयी तो इनके आधे दुःख अपने आप ही दूर हो जायेंगे |